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जंगल की खुशबू मिट्टी की सादगी और परंपराओं की पहचान मोतीपुर कला के थारू जनजाति का अनोखा जीवन
- दैनिक लोक भारती
- 26 Jul, 2026
श्रावस्ती। भारत-नेपाल सीमा से सटे श्रावस्ती जनपद का मोतीपुर कला गांव थारू जनजाति की समृद्ध संस्कृति परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते का जीवंत उदाहरण है। आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बीच भी यहां के थारू परिवार आज अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखे हुए हैं। उनका रहन-सहन खान-पान पहनावा लोकगीत नृत्य और जीवनशैली उन्हें अन्य समुदायों से अलग पहचान दिलाती है।शिक्षा के प्रसार से सामाजिक जागरूकता बढ़ी है, जिससे रोजगार और जीवन स्तर में सुधार आया है।पहले मुख्यत कृषि, वनोपज और पशुपालन पर निर्भरता थी, अब सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। शिक्षा और सरकारी योजनाओं के कारण महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक भागीदारी पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ी है।
प्रकृति के बीच बसा जीवन
थारू समुदाय का जीवन जंगल खेत और नदियों से जुड़ा हुआ है। इनके घर पहले मिट्टी, बांस और फूस से बनाए जाते थे। जिनकी दीवारों पर महिलाएं मिट्टी और गोबर से सुंदर कलात्मक आकृतियां बनाती थीं। अब कुछ घर पक्के बन गए हैं। लेकिन गांव की सादगी आज भी बरकरार है।
खान-पान में देसी स्वाद
थारू समाज का भोजन पूरी तरह स्थानीय संसाधनों पर आधारित होता है। धान और मक्का इनकी मुख्य फसलें हैं। भोजन में चावल, मोटे अनाज की रोटी दाल मौसमी हरी सब्जियां मछली और जंगल से मिलने वाले खाद्य पदार्थ प्रमुख हैं। पारंपरिक व्यंजन सादगी के साथ पोषण का भी बेहतरीन उदाहरण हैं।
पहनावे में परंपरा की झलक
थारू महिलाओं का पारंपरिक पहनावा रंग-बिरंगे घाघरा चोली और ओढ़नी होता है।वे चांदी के बड़े-बड़े आभूषण चूड़ियां पायल और हार पहनना पसंद करती हैं। पुरुष पारंपरिक रूप से धोती-कुर्ता या साधारण वस्त्र पहनते रहे हैं हालांकि नई पीढ़ी आधुनिक परिधान भी अपनाने लगी है।
लोकगीत और नृत्य हैं पहचान
किसी भी त्योहार या शादी-ब्याह में थारू समाज के लोकगीत और पारंपरिक नृत्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। ढोल, मंजीरा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर महिलाएं और पुरुष सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। इन गीतों में प्रकृति, प्रेम, खेती और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है।
त्योहारों का अनोखा रंगथारू समुदाय
होली दीपावली और अन्य राष्ट्रीय पर्वों के साथ-साथ अपने पारंपरिक पर्व भी पूरे उत्साह से मनाता है। इन अवसरों पर सामूहिक भोज लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे सामाजिक एकता और भाईचारा मजबूत होता है।
शिक्षा और बदलाव की नई राह
सरकारी योजनाओं और शिक्षा के बढ़ते प्रसार से अब थारू समाज के युवा उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं की ओर बढ़ रहे हैं। गांव में बच्चों की स्कूलों में संख्या बढ़ी है। महिलाएं भी स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
चुनौतियां अब भी बाकी
विकास की राह पर आगे बढ़ने के बावजूद रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। युवाओं का शहरों की ओर पलायन भी धीरे-धीरे पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित कर रहा है।
लोकतांत्रिक भागीदारी
थारू समाज के लोग पंचायत, जिला पंचायत, नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में सक्रिय रूप से मतदान करते हैं और जनप्रतिनिधि भी बनते हैं।कई थारू पुरुष और महिलाएँ ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य तथा जिला पंचायत सदस्य के रूप में कार्य कर चुके हैं और ग्रामीण विकास में योगदान दे रहे हैं।थारू समुदाय के प्रतिनिधि वन अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा भूमि से जुड़े मुद्दों को सरकार के समक्ष उठाते रहे हैं।पंचायतों में आरक्षण के कारण थारू महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है, जिससे निर्णय प्रक्रिया में उनकी भूमिका मजबूत हुई है।
संस्कृति को सहेजना समय की जरूरत
मोतीपुर कला का थारू समाज केवल एक जनजाति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक है। उनकी परंपराएं लोककला और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन आज भी समाज को पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक जीवन का संदेश देता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित रहे ताकि आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल विरासत से परिचित हो सकें।
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